समुद्र मंथन की कहानी
इस संसार में "श्री" को पुनः स्थापित करने और देवताओं को शक्तिशाली बनाने के लिए समुद्र मंथन किया गया था जिसमे 14 रत्न निकलते है जिनके बारे में हम आगे बात करेंगे इससे पहले हम समुद्र मंथन की कहानी में जानेंगे की देवता श्री हीन क्यों हो गए थे| समुद्र मंथन |
दुर्वासा ऋषि का श्राप
- एक बार देवराज इंद्र भ्रमण पर निकले थे रास्ते में उनकी भेट दुर्वासा ऋषि से होती है, दुर्वासा ऋषि देवराज इंद्र को पारिजात पुष्प की माला भेट स्वरूप देते है। देवराज इंद्र अपने घमंड में चूर थे जिस कारण उन्होंने पुष्पमाला का उचित सम्मान नहीं करते और उसे ऐरावत को पहना देते। ऐरावत उसे तोड़ कर छिन्न भिन्न कर देता है, दुर्वासा ऋषि अपनी भेट का इस तरह अनादर देखकर रुष्ट हो जाते है और इंद्र को श्रीहीन होकर स्वर्ग से वंचित होने का श्राप दे देते है। यह बात जैसे ही असुर गुरु शुक्राचार्य को पता चलती है वह तुरंत दैत्यराज बाली के पास पहुंच कर पूरी घटना के बारे में बताते है और इस अवसर का लाभ उठाकर असुरों को तुरंत आक्रमण करके स्वर्ग पर अधिकार कर लेने की सलाह देते है। दैत्यराज बाली सभी असुरों के साथ स्वर्ग पर आक्रमण कर देते है देवता दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण असुरों से हार जाते है और स्वर्ग पर असुर अपना राज स्थापित कर लेते है ।
- असुरों से पराजित होने के पश्चात सभी देवता नारद मुनि के साथ ब्रह्मा देव के पास जाते हैं और सारी बात बताते हैं। ब्रम्ह देव उन्हे नारायण के पास जाने को कहते है फिर नारद सहित सभी देवतागण भगवान विष्णु के पास पहुंचते हैं। भगवान विष्णु उन सभी को बताते है की दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण देवी लक्ष्मी विलुप्त हो गई है और समस्त संसार श्री हीन हो गया है जिस कारण देवता दुर्बल हो गए है तब नारद मुनि इस समस्या का उपाय पूंछते है तब भगवान विष्णु सभी को लेकर महादेव के पास जाते हैं जहा देवो को पुनः शक्तिशाली बनाने और संसार में श्री को पुनः स्थापित करने के लिए सभी निर्णय लेते हैं कि समुद्र मंथन किया जाए जिसमे से अमृत भी निकलेगा जिसे पीकर सभी अमर हो जायेंगे।
समुद्र मंथन
सभी देवता समुद्र मंथन की तैयारी करते हैं किंतु समुद्र मंथन के लिए असुरों की भी आवश्यकता थी इसलिए भगवान शिव के आदेशानुसार इन्द्र ने समुद्र मंथन से अमृत निकलने की बात बाली को बताई और कहा कि अमृत का हम समान वितरण कर अमर हो जाएंगे किंतु बाली को इंद्र की बात पर विश्वास नहीं होता है तब नारद मुनि दैत्य सेनापति राहु के पास पहुंचकर उसे शिव जी का संदेश सुनाते हैं। राहु यह बात शुक्राचार्य से कहता है, तब दैत्यराज बाली को शुक्राचार्य बताते हैं कि उन्हें शिव की निष्पक्षता पर पूर्ण विश्वास है। यदि शिव जी समुद्र मंथन करने को कह रहे हैं तो अवश्य किया जाना चाहिए। दैत्यों के मान जाने के बाद मंदराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकि नाग को नेती बनाया जाता है किंतु मंदराचल पर्वत आधारहीन होने के कारण समुंद्र में डूबने लगता हैं तब स्वयं भगवान श्री विष्णु कूर्म अवतार लेते है और मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर रखकर उसका आधार बनते हैं। देवताओ को पता था की दैत्य हमेशा वही करेंगे जो देवता करेंगे इसीलिए वासुकि नाग को मुख की और से पकड़ने लगे। इस पर उल्टी बुद्धि वाले दैत्यों ने सोचा कि वासुकि नाग को मुख की ओर से पकड़ने में अवश्य कुछ न कुछ लाभ होगा उन्होंने देवताओं से कहा कि हम किसी से शक्ति में कम नहीं हैं इसलिए हम मुंह की ओर रहेंगे। तब देवताओं ने वासुकि नाग के पूंछ की ओर का स्थान ले लिया।समुद्र मंथन के 14 रत्नों का रहस्य
समुद्र मंथन से 14 रत्नों की उत्पति होती है जिसमे सबसे आखिर में अमृत कलश निकलता है।
1. हलहल (विष)
जब मंथन होने लगा तब सबसे पहले विष का प्याला निकला जिसे कालकूट कहा गया तथा इस जहर को हलाहल भी कहा जाता है, जब हलाहल प्रकट होता है तो सम्पूर्ण सृष्टि में उथल पुथल मच जाता है। इसे न तो देवता ग्रहण करना चाहते थे और न ही असुर। यह विष इतना खतरनाक था की संपूर्ण ब्रह्मांड का विनाश कर सकता था, तब इस विष को ग्रहण करने के लिए स्वयं भगवान शिव आते है। भगवान शिव ने विष पी लिया तभी माता पार्वती ने उनके गले को पकड़ लेती इसीलिए विष उनके गले में ही अटक गया जिसकी वजह से उनका गला नीला पड़ गया और तब से महादेव को नीलकंठ भी कहा जाता है।2. कामधेनु
कालकूट को शिव जी के धारण कर लेने के पश्चात समुद्र मंथन को पुनः शुरू किया जाता है जिनमे से कामधेनु गाय की उत्पत्ति होती हैं। कामधेनु ऋषियों को सौंप दी जाती है, क्योंकि इसे भी कोई नही लेना चाहता था।3. उच्चैःश्रवा
मंथन को आगे बढ़ाया जाता है जिसमे तीसरा रत्न एक श्वेत रंग के घोड़े की उत्पत्ति होती है जो आकाश में उड़ सकता था जिसका नाम उच्चैःश्रवा था जिसे राजा बलि को सौंप दिया गया।4. ऐरावत
जिसके उपरांत श्वेत रंग का चार दांत और सात सूंढ वाला एक दिव्य हाथी ऐरावत प्रकट होता है जो देवराज इंद्र को दिया गया।5. कौस्तुभ मणि
पांचवा रत्न में एक दिव्य कौस्तुभ मणि की उत्पत्ति होती है इस मणि में आपदाओं से सुरक्षित रखने की शक्ति थी यह मणि राजा बलि को दी जाती है। राजा बलि प्राप्त मणि को भगवान विष्णु को सौंप देते है।6. कल्पवृक्ष
जिसके बाद कल्पवृक्ष प्रकट होता जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाला एक वृक्ष होता है जिसे स्वर्ग में स्थापित किया जाता है।
7. रंभा
कल्प वृक्ष के बाद मंथन से एक सुंदर अप्सरा रंभा की उत्पत्ति हुई जो वह असुरों को देख भयभीत हो जाती है जिस कारण वह देवताओं के पास चली गई जिन्हे सभा की प्रमुख नृत्यांगना का पद दिया जाता है।8. देवी लक्ष्मी
उसके बाद देवी लक्ष्मी की उत्पत्ति हुईं। समुद्र से जब देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं, तब वह खिले हुए श्वेत कमल के आसन पर विराजमान थीं उनके हाथ में कमल था देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु का वरण किया। उनके प्रकट होने से समस्त संसार में दरिद्रता का नाश हो जाता है।9. वारुणी
समुद्र मंथन के दौरान नौवें नंबर पर वारूणी प्रकट हुई जिसेे दैत्यों ने ले लिया वास्तव में वारूणी का अर्थ मदिरा है और यही कारण है कि दैत्य हमेशा मदिरा में डूबे रहते थे10. चंद्रमा
तत्पश्चात चंद्रमा प्रकट होते है जिन्हे भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया11. पारिजात
जिसके पस्चात परिजात वृक्ष प्रकट होता है जिसे स्वर्ग में स्थापित करते है और बाद में उसे अर्जुन पृथ्वी पे ले आते है ।12. शंख
परिजात के बाद पांचजन्य शंख की उत्पत्ति हुई जिसे भगवान विष्णु ने धारण किया इस शंख को "विजय का प्रतीक" माना गया है साथ ही इसकी ध्वनि को भी बहुत ही शुभ माना गया हैl विष्णु पुराण के अनुसार माता लक्ष्मी समुद्रराज की पुत्री हैं तथा शंख उनका सहोदर भाई है। अतः यह भी मान्यता है कि जहाँ शंख है, वहीं लक्ष्मी का वास होता है। इन्हीं कारणों से हिन्दुओं द्वारा पूजा के दौरान शंख को बजाया जाता है13. धनवंतरी
समुद्र मंथन के दौरान सबसे अंत में हाथ में अमृतपूर्ण स्वर्ण कलश लिये श्याम वर्ण, चतुर्भुज रूपी भगवान धन्वन्तरि प्रकट हुए भगवान धनवंतरी जी को देवो के वैद्य का पद प्राप्त होता है और जब पृथ्वी पर मनुष्य रोगों से अत्यन्त पीड़ित हो गए तो इन्द्र ने धन्वन्तरि जी से प्रार्थना की की वह पृथ्वी पर अवतार लेंl इन्द्र की प्रार्थना स्वीकार कर भगवान धन्वन्तरि ने काशी के राजा दिवोदास के रूप में पृथ्वी पर अवतार धारण किया इनके द्वारा रचित "धन्वन्तरि-संहिता" आयुर्वेद का मूल ग्रन्थ है। आयुर्वेद के आदि आचार्य सुश्रुत मुनि ने धन्वन्तरि जी से ही इस शास्त्र का उपदेश प्राप्त किया था इसीलिए इन्हें सर्वप्रथम वैद्य का पद प्राप्त है ।Read More:- धनवंतरी जी की कहानी
14. अमृत कलश
जब धन्वन्तरि जी अमृत कलश ले कर प्रकट हुए तब देवता चाहते थे कि अमृत के प्याले में से एक भी घूंट असुरों को न मिल पाए, नहीं तो वे अमर हो जाएंगे, वहीं असुर अपनी शक्तियों को बढ़ाने और अमर रहने के लिए अमृत का पान किसी भी रूप में करना चाहते थे। अमृत को असुरों को पिलाना घातक हो सकता था इसलिए देवताओं और असुरों के बीच विवाद उत्पन्न हुआ।कुंभ मेला कहा कहा और क्यों लगता हैं
- अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं के इशारे पे इंद्रपुत्र जयंत अमृत कलश को लेकर आकाश में उड़ जाता उसके बाद दैत्य गुरु शुक्राचार्य के आदेश पर दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के पस्चात उन्होंने जयंत को बीच रास्ते में ही पकड़ लिया तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देवो और दानवों में 12 दिन तक अविराम युद्ध होता रहा। इस परस्पर मार-काट के दौरान पृथ्वी के 4 स्थानों पर कलश से अमृत बूंदें गिर जाती है जिसमे सर्वप्रथम हरिद्वार में बह रही पावन नदी गंगा में कुंभ से अमृत गिरते ही हरिद्वार कुंभ मेले का पावन स्थान बन गया। जब यह अमृत छलका, तब उस समय सूर्य और चंद्र मेष राशि में और बृहस्पति कुंभ राशि में भ्रमण कर रहे थे। उसके पश्चात प्रत्येक 12 वर्ष के अंतर से हरिद्वार में कुंभ मेला लगता आया है। दूसरी अमृत की बूंद प्रयागराज में गिरी। जिस समय प्रयाग में यह अमृत गिरा था उस समय बृहस्पति वृषभ राशि तथा सूर्य और चंद्र मकर राशि में भ्रमण कर रहे थे। उस समय से यहां कुंभ मेला लगने की प्रथा प्रारंभ हुई। अमावस्या तथा मकर संक्रांति के अवसर पर प्रयाग का पावन जल विशेष रूप से अमृत हो जाता है। तीसरी अमृत की बूंद उज्जैन की शिप्रा नदी में गिर जाती है जिस समय यह अमृत की बूंद गिरती है उस समय बृहस्पति सिंह, सूर्य मेष और चंद्र तुला राशि में भ्रमण कर रहे थे। बृहस्पति के सिंह राशि में होने के कारण उज्जैन के कुंभ मेले को 'सिंहस्थ' भी कहा जाता है। चौथी अमृत की बूंद नासिक की गोदावरी नदी में गिरती है। जब यह अमृत छलका था उस समय बृहस्पति, सूर्य और चंद्र तीनों ही सिंह राशि में भ्रमण कर रहे थे। जब भी ऐसी स्थिति बनती है तब वहां कुंभ मेला लगता है।
- जिस समय में चंद्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहां-जहां अमृत बूंदें गिरी थीं, वहां वहां कुंभ मेले का आयोजन होता है। मकर में सूर्य व वृष के बृहस्पति के संयोग से 2012 में प्रयागराज में कुंभ महापर्व के रूप में मनाया गया था।
- देवता और असुरों के इस अंतहीन युद्ध को देखकर देवर्षि नारद प्रकट होते हैं। वे दोनों को समझाते हुए कहते हैं इस तरह तो सभी अमृत धरती पर ही गिर जाएगा।आपको आपस में अमृत मिल-बांटकर पीना चाहिए।
अमृत का बटवारा कैसे हुआ
- नारद मुनि के समझने पर दोनो पक्ष सहमत हो जाते हैं लेकिन कहते हैं कि इस अमृत का विभाजन बराबर मात्रा में कैसे और कौन करेगा? तभी वहां मोहिनी रूप में भगवान विष्णु प्रकट होते हैं जिसे देखकर दैत्य और देवता दोनों ही मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। उसकी सुंदरता के वश में होकर दैत्य उसको अमृत वितरण करने का अधिकार सौंपने का प्रस्ताव मान लेते हैं।
- एक सुंदर सभागार में अमृत वितरण का आयोजन होता है। मोहनी के नृत्य, गीत और संगीत के बीच एक बार देवता को और फिर एक दैत्य को इस तरह बारी-बारी से अमृत वितरण होता है। जब देवताओं को अमृत पिलाया जाता है तब वह असली कुंभ होता है, लेकिन जब दैत्य को पिलाया जाता है तो वह नकली कुंभ होता है। इस छल का पता दैत्यों के सेनापति राहू को चल जाता है किंतु वह इस पर कुछ नहीं कहता बल्कि अपना रूप बदलकर देवताओं में सूर्य और चंद्र के बीच बैठ जाता है।
- जब वह अमृत अपने प्याले में ले लेता है तभी सूर्य और चंद्र शंका प्रकट करते हुए कहते हैं कि ये तो कोई दैत्य है यह जानकर मोहिनी रूप से भगवान विष्णु अपने असली रूप में आ जाते हैं और तुरंत ही अपने चक्र से उसकी गर्दन काट देते हैं लेकिन तब तक अमृत उसके कंठ तक पहुंच चुका होता है इस कारण उसकी गर्दन अलग होने के बावजूद वह जीवित रह जाता है। उसके सिर के रूप को राहू और धड़ को केतु कहा जाता है।
- सूर्य और चंद्र के कारण मस्तक कटने से राहु दोनों से शत्रुता मान लेता है और तब से उन्हे ग्रहण लगाता रहता है ।
आप को यह जानकारी कैसी लगी और आपको इस बारे में कुछ और जानकारी है तो कमेंट में जरूर बताएं ।
Q. समुद्र मंथन में किसे मथनी बनाया गया था?
Ans:- समुद्र को मथने के लिए मद्राचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को neti बनाया गया था।
Q. भगवान विष्णु जी ने कूर्म अवतार क्यों लिया था?
Ans:- भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार मद्रांचल पर्वत को पानी में रोकने के लिए आधार चाहिए था तब विष्णु जी ने कूर्म अवतार लेकर उसे अपनी पीठ पर धारण किया था।