आप सभी जानते होंगे की शुक्राचार्य असुरों के गुरु है, और वह शिव जी के परम भक्त भी थे। किंतु क्या आपको पता है की असुर गुरु शुक्राचार्य भगवान विष्णु से इतनी सत्रुता क्यों मानते थे? क्या कारण था भगवान विष्णु से इतनी नफरत करने का? आज के इस लेख में हम न केवल शुक्राचार्य की नफरत का कारण जानेंगे, बल्कि शुक्राचार्य के जीवन काल के बारे में भी कुछ बाते जानेंगे।
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| भगवान शिव |
शुक्राचार्य का परिचय
- शुक्राचार्य ऋषि भृगु तथा काव्यमाता के पुत्र थे। वे शिव जी के परम भक्त थे। इनके कई विवाह का वर्णन मिलता है। मुख्यता शुक्राचार्य की पहली पत्नी उर्जस्वती थीं। उर्जस्वती, ब्रह्मा के मानस पुत्र प्रियव्रत की पुत्री थीं। उर्जस्वती और शुक्राचार्य के दो बेटे थे, जिनके नाम अमर्क और शंद थे।
- इनकी दूसरी पत्नी जयंती थी जो देवराज इंद्र की पुत्री थी।
- शुक्राचार्य की एक पुत्री भी थी, जिनका नाम देवयानी थी। देवयानी का विवाह महाराज ययाति से हुआ था।
शुक्राचार्य की आंख कैसे फूटी
आप सभी ने देखा होगा की शुक्राचार्य को एक आंख के साथ दर्शाया जाता है, किंतु क्या आपको पता है की शुक्राचार्य की आंख कैसे फूटी? यह बात तब की है, जब राजा बलि यज्ञ कर रहे थे और वहा भगवान विष्णु वामन अवतार धारण कर राजा बलि से दान मांगने आते है। राजा बलि ने उनसे उनकी इच्छा अनुसार दान मांगने को कहा। तब वामन अवतार उनसे कहते है की पहले वह दान देने का संकल्प करे। जब राजा बलि संकल्प करने के लिए कमंडल से जल लेने चले, तो शुक्राचार्य उस कमंडल की टोंटी में बैठ जाते है ताकि जल न निकल सके। वामन अवतार शुक्राचार्य की चाल को समझ जाते है कि वह अपने शिष्य का हित साधने के लिए कमंडल में बैठे हैं। उन्होंने टोंटी में सींक डाली, जिससे शुक्राचार्य की आंख फूट गई। शुक्राचार्य को एक आंख खोने के कारण 'एकाक्ष' भी कहा जाता है।
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| शुक्राचार्य |
असुर गुरु शुक्राचार्य भगवान विष्णु से इतनी सत्रुता क्यों मानते थे
दैत्य गुरु शुक्राचार्य जिन्होंने भगवान शिव की आराधना कर संजीवनी मंत्र प्राप्त किया, वे भगवान विष्णु से इतनी सत्रुता क्यों मानते थे। इसका कारण था भगवान विष्णु के द्वारा शुक्राचार्य की माता का वध। एक बार शुक्राचार्य कई वर्षो से तपस्या में लीन थे और इस बीच देवताओं और असुरो के मध्य युद्ध शुरू हो जाता है। इस देवासुर संग्राम में राक्षस बुरी तरह हार जाते है और छिपने का स्थान खोजते हुए शुक्राचार्य के आश्रम पहुंचते है। जब राक्षस वहा पहुंचे, तब ऋषि भृगु और शुक्राचार्य आश्रम में नही थे। तब राक्षसों ने काव्यमाता से शरण मांगी। काव्यमाता ने सभी असुरों को आश्रम में छिपा लिया। जब सभी देवता वहा पहुंचे तब काव्यमता ने उन सभी को बेहोश कर दिया। यह देख इंद्र ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी और भगवान विष्णु ने क्रोध में काव्यमाता का सिर सुदर्शन चक्र से काट दिया। स्त्री हत्या के कारण रिशी भृगु ने विष्णु जी को मनुष्य योनि में जन्म लेने और अपनी पत्नी से बिछड़ने का श्राप दे दिया। शुक्राचार्य को तपस्या से उठने के पस्चात जब अपनी मां की हत्या के बारे में ज्ञात हुआ तब वह क्रोध से भर उठे और उन्होंने भगवान विष्णु से सत्रुता शुरू कर ली।

